जहां फूल होने थे, वहां गांजा लहलहाया: लोढ़ी की सरकारी पौधशाला या ‘मजाकशाला’ ?
उत्तर प्रदेश
05:32 PM, Apr 21, 2026
सोनभद्र। सरकारी दावों में हरियाली की लंबी-चौड़ी कहानी है, लेकिन ज़मीनी हकीकत लोढ़ी स्थित राजकीय पौधशाला में कुछ और ही किस्सा सुना रही है। यहां पौधशाला कम, लापरवाही का “लाइव डेमो” ज्यादा नजर आता है—और इस डेमो का स्टार परफॉर्मर है प्रवेश द्वार के बगल में शान से लहलहाता गांजे का पौधा।

जिला उद्यान परिसर में मौजूद गांजे का पौधा।
Share:
Published By
Neeraj Shukla
हैरानी की बात यह है कि जहां विभाग को फल, फूल और सजावटी पौधों की नर्सरी तैयार करनी चाहिए थी, वहां गिनती के आम, अमरुद और आंवला के पौधे किसी तरह अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। फूलों की बागवानी का तो यहां ऐसा अकाल है, मानो विभाग ने रंग-बिरंगी दुनिया से ही दूरी बना ली हो।
हालात इतने “उत्कृष्ट” हैं कि जो पौधे मौजूद हैं, वे भी देखरेख के अभाव में सूखने की ट्रेन पकड़ चुके हैं। पानी, खाद और निगरानी सब कागज़ों में ही हरे-भरे लगते हैं, जमीन पर तो सूखा ही सूखा नजर आता है।
और इसी सूखेपन के बीच “हरियाली का असली ब्रांड एंबेसडर” बना हुआ है गांजे का पौधा—वह भी ठीक प्रवेश द्वार के पास। यानी जो चीज़ कानूनन नहीं होनी चाहिए, वही यहां सबसे बेहतर तरीके से पनप रही है। अब सवाल ये उठता है कि क्या विभाग ने पौधशाला को प्रयोगशाला बना दिया है या फिर यह सब “अनदेखी की कला” का बेहतरीन नमूना है?
स्थानीय लोगों की मानें तो सरकारी पौधशाला से उम्मीद थी कि यहां सस्ते और अच्छे पौधे मिलेंगे, लेकिन हकीकत यह है कि लोग अब निजी नर्सरियों की ओर भाग रहे हैं। महंगे दाम चुकाने के बावजूद वहीं से अपनी जरूरत पूरी करनी पड़ रही है, जिससे आम लोगों का रुझान पौधरोपण की ओर कम होता जा रहा है। कुल मिलाकर, लोढ़ी की यह पौधशाला अपने उद्देश्य से भटकती नजर आ रही है। जहां हरियाली का संदेश देना था, वहां लापरवाही की तस्वीर उभर रही है। अब देखना यह होगा कि जिम्मेदार अधिकारी इस स्थिति पर संज्ञान लेते हैं या फिर यह पौधशाला यूं ही सवालों के घेरे में बनी रहती है।

