सोनभद्र बना प्रदेश में जल प्रबंधन का मॉडल, : प्रशासन व विभागीय समन्वय से कायम संतुलन
सोनभद्र (उत्तर प्रदेश)
09:19 AM, Mar 29, 2026
प्रदेश में गहराते भूजल संकट के बीच सोनभद्र जिले ने जिला प्रशासन, सिंचाई विभाग और पंचायती राज विभाग के प्रभावी समन्वय, सुदृढ़ रणनीति और जमीनी क्रियान्वयन के दम पर जल प्रबंधन का एक सफल मॉडल प्रस्तुत किया है। जहां प्रदेश के कई जिलों में भूजल का अनियंत्रित दोहन चिंताजनक स्तर पर पहुंच चुका है, वहीं सोनभद्र में मात्र 49 प्रतिशत भूजल दोहन दर्ज किया गया है, जो संतुलित और नियंत्रित उपयोग को दर्शाता है।

प्रतिकात्मक फोटो।
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Published By
Neeraj Shukla
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इसके विपरीत गाजियाबाद (123%), आगरा (111%), गौतमबुद्धनगर (105%) जैसे जिलों में भूजल दोहन अत्यधिक स्तर पर पहुंच चुका है। वहीं शामली (100%), फिरोजाबाद (98%), संतकबीरनगर (96%), बागपत (95%) तथा चंदौली व हमीरपुर (93%) में भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। इसके अलावा वाराणसी (89%), महाराजगंज (88%), मुरादाबाद (86%), ललितपुर (83%) और चित्रकूट व कौशांबी (81%) में भी भूजल पर दबाव लगातार बढ़ रहा है।
■ जिलाधिकारी के नेतृत्व में विभागीय समन्वय से बदली तस्वीर
सोनभद्र में यह उपलब्धि जिला प्रशासन के नेतृत्व में विभिन्न विभागों के प्रभावी तालमेल का परिणाम है—
▪ जिला प्रशासन द्वारा योजनाओं की सतत मॉनिटरिंग और प्रभावी क्रियान्वयन ▪ सिंचाई विभाग द्वारा जल संचयन संरचनाओं का विकास और संरक्षण ▪ पंचायती राज विभाग द्वारा ग्रामीण स्तर पर जल स्रोतों का पुनर्जीवन और रखरखाव
➡ तीनों स्तरों पर समन्वित प्रयासों ने जल संरक्षण को जन आंदोलन का रूप दिया है।
जिलाधिकारी सोनभद्र ।
■ मैदानी स्तर पर दिखा असर, संरचनात्मक कार्यों को मिली गति
संयुक्त प्रयासों के तहत जिले में बड़े स्तर पर कार्य कराए गए—
▪ स्कूलों व सरकारी भवनों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम स्थापित ▪ अमृत सरोवर योजना के तहत तालाबों का सुंदरीकरण और गहरीकरण ▪ पारंपरिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित करते हुए नए कुओं का निर्माण ▪ गांव-गांव में जागरूकता अभियान चलाकर जनभागीदारी सुनिश्चित
➡ इन पहलों से भूजल स्तर में सुधार और जल संतुलन बनाए रखने में मदद मिली है।
■ प्राकृतिक अनुकूलता और प्रशासनिक प्रयासों का संतुलन
सोनभद्र की भौगोलिक स्थिति ने भी इन प्रयासों को मजबूती दी—
▪ प्राकृतिक जल संचयन की बेहतर क्षमता ▪ सीमित शहरीकरण से भूजल पर कम दबाव ▪ पारंपरिक स्रोतों का संरक्षण
➡ प्रशासनिक योजनाओं और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलन ने जिले को सुरक्षित स्थिति में बनाए रखा है।
■ प्रदेश में गहराता संकट, सोनभद्र बना अपवाद
जहां प्रदेश के कई जिलों में जल स्तर 200–250 फीट तक नीचे जा चुका है और हैंडपंप सूखने लगे हैं, वहीं सोनभद्र में स्थिति नियंत्रण में बनी हुई है।
➡ यह स्थिति जिला प्रशासन और संबंधित विभागों की सक्रियता और दूरदर्शिता को दर्शाती है।
■ कुछ क्षेत्रों में अब भी किल्लत, फोकस जरूरी
हालांकि समग्र स्थिति संतुलित है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में पानी की किल्लत बनी हुई है—
➡ प्रभावित क्षेत्रों में विशेष कार्ययोजना लागू करने की जरूरत ➡ विभागीय समन्वय को और मजबूत करने की आवश्यकता ➡ जनभागीदारी को निरंतर बनाए रखना होगा
■ सतत प्रयासों से ही कायम रहेगी बढ़त
विशेषज्ञों का मानना है कि जिला प्रशासन, सिंचाई विभाग और पंचायती राज विभाग के समन्वित प्रयासों के साथ आमजन की सहभागिता ही इस उपलब्धि को स्थायी बना सकती है।
➡ सोनभद्र ने यह साबित कर दिया है कि मजबूत प्रशासनिक इच्छाशक्ति, विभागीय तालमेल और जनसहभागिता से जल संकट का प्रभावी समाधान संभव है। ➡ आने वाले समय में यह मॉडल प्रदेश ही नहीं, बल्कि देश के लिए भी प्रेरणा और मार्गदर्शक साबित हो सकता है।

