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न्यूज़rebor model of corruption exposed in the district investigation confirms fake payment

जिले में भ्रष्टाचार का ‘रिबोर मॉडल’ बेनकाब:: जांच में फर्जी भुगतान की पुष्टि

उत्तर प्रदेश

07:43 AM, Feb 27, 2026

सोनभद्र के कोन ब्लॉक की पड़रछ ग्राम पंचायत में हैंडपंप रिबोर के नाम पर 1.74 लाख रुपये का भ्रष्टाचार सामने आया है। चार में से दो रिबोर फर्जी पाए गए। IGRS शिकायत पर जांच हुई, प्रधान और सचिव को नोटिस जारी किया गया है। मामला अब जिले की अन्य पंचायतों में भी संभावित गड़बड़ी की ओर इशारा कर रहा है।

जिले में भ्रष्टाचार का ‘रिबोर मॉडल’ बेनकाब:: जांच में फर्जी भुगतान की पुष्टि

प्रतीकात्मक दृश्य।

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Neeraj Shukla

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Neeraj Shukla

 भ्रष्टाचार: कागजों पर काम, जमीन पर हकीकत गायब


डिजिटल डेस्क 


सोनभद्र। जिले के कोन ब्लॉक अंतर्गत पड़रछ ग्राम पंचायत में हैंडपंप रिबोर के नाम पर 1,74,640 रुपये के भ्रष्टाचार का मामला सामने आया है। जांच में दो रिबोर कार्यों में गंभीर अनियमितता और फर्जी भुगतान की पुष्टि होने के बाद ग्राम प्रधान और सचिव को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है।
मामले का खुलासा तब हुआ जब गांव के एक ग्रामीण ने आईजीआरएस पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई। शिकायत को संज्ञान में लेते हुए उप निदेशक पंचायत राज, मिर्जापुर के निर्देश पर डीपीआरओ नमिता शरण ने स्थल निरीक्षण कर जांच की।
जांच के दौरान चार हैंडपंप रिबोर कार्यों का भौतिक सत्यापन कराया गया। रिपोर्ट के अनुसार, दो रिबोर सही पाए गए, लेकिन दो में कार्य और भुगतान दोनों में गड़बड़ी मिली। आरोप है कि कागजों में कार्य दिखाकर सरकारी धनराशि का भुगतान ले लिया गया। जांच में कुल 1,74,640 रुपये के दुरुपयोग की पुष्टि की गई है। डीपीआरओ ने संबंधित प्रधान और सचिव से निर्धारित समयावधि में स्पष्टीकरण मांगा है। संतोषजनक जवाब न मिलने पर धनराशि की वसूली और विभागीय कार्रवाई की बात कही गई है।

क्या जिले भर में फैला है नेटवर्क ?


यह मामला केवल एक ग्राम पंचायत में भ्रष्टाचार का उदाहरण भर नहीं है, बल्कि जिले की पंचायत व्यवस्था पर व्यापक प्रश्नचिह्न भी खड़ा करता है। यदि पेयजल जैसी बुनियादी सुविधा के नाम पर कागजी हेराफेरी संभव है, तो अन्य विकास कार्यों में भी इसी प्रकार के भ्रष्टाचार की आशंका जताई जा रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह गड़बड़ी संकेत देती है कि जिले के अन्य इलाकों में भी हैंडपंप रिबोर, शौचालय निर्माण, नाली-खड़ंजा और अन्य योजनाओं में इसी तरह का भ्रष्टाचार हो सकता है। सवाल यह भी है कि बिना शिकायत के ऐसे मामलों का स्वतः संज्ञान क्यों नहीं लिया जाता?


पंचायत स्तर पर होने वाले विकास कार्यों में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। भुगतान से पहले भौतिक सत्यापन, जियो-टैगिंग और नियमित ऑडिट की व्यवस्था होने के बावजूद यदि भ्रष्टाचार सामने आ रहा है, तो यह निगरानी तंत्र की कमजोरी को दर्शाता है।

 ‘रिबोर रैकेट’

क्या और खुलेंगे राज? 

पड़रछ का यह प्रकरण सिर्फ 1.74 लाख रुपये की रकम तक सीमित नहीं है। यह ग्रामीण विकास योजनाओं में व्याप्त संभावित भ्रष्टाचार की परतें खोलने वाला मामला बनता जा रहा है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस मामले में कितनी सख्ती से कार्रवाई करता है और क्या अन्य पंचायतों में भी इसी तरह की व्यापक जांच कराई जाती है।

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