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न्यूज़nodal remained the same officer for 45 months in five years still the magic of illegal hospitals is not broken

पांच साल में 45 माह एक ही अधिकारी रहे नोडल,: फिर भी नहीं टूटा अवैध अस्पतालों का तिलिस्म

sonbhadra

09:31 PM, Feb 16, 2026

सोनभद्र में अवैध और मानकविहीन अस्पतालों का संचालन एक रहस्यमय तिलिस्म बन गया है। बीते 5 वर्षों में करीब 45 माह तक एक ही अधिकारी के पास नोडल की जिम्मेदारी रहने के बावजूद जिला मुख्यालय से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक बिना पंजीकरण, बिना विशेषज्ञ चिकित्सकों और बिना सुरक्षा मानकों के सैकड़ों अस्पताल, क्लीनिक और पैथोलॉजी सेंटर संचालित हो रहे हैं।

पांच साल में 45 माह एक ही अधिकारी रहे नोडल,: फिर भी नहीं टूटा अवैध अस्पतालों का तिलिस्म

मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय सोनभद्र।

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Neeraj Shukla

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Neeraj Shukla

सोनभद्र में अवैध अस्पतालों का रहस्यमय तिलिस्म

-   बिना विशेषज्ञों के ऑपरेशन और कार्रवाई न के बराबर
नीरज शुक्ला 

सोनभद्र। जनपद में अवैध रूप से संचालित निजी अस्पतालों का नेटवर्क अब एक रहस्यमय तिलिस्म का रूप ले चुका है, जहां नियमों और मानकों की खुलेआम अनदेखी के बावजूद कार्रवाई न के बराबर हो रही है। बीते 5 वर्षों में करीब 10 बार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 45 महीनों तक डॉ.जी. एस. यादव के पास नोडल अधिकारी की जिम्मेदारी रही, लेकिन इस लंबे कार्यकाल के बावजूद जिले में अवैध अस्पतालों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित नहीं हो सका है।
जिला मुख्यालय से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक बड़ी संख्या में निजी अस्पताल, क्लीनिक और पैथोलॉजी केंद्र संचालित हो रहे हैं, जिनमें से कई के पास न तो विधिवत पंजीकरण है और न ही मानकों के अनुरूप संसाधन उपलब्ध हैं। सबसे गंभीर पहलू यह है कि कई अस्पतालों में बिना सर्जन और एनेस्थीसिया विशेषज्ञ की उपलब्धता के ही ऑपरेशन किए जा रहे हैं, जो सीधे तौर पर मरीजों के जीवन को खतरे में डालने जैसा है। जिला मुख्यालय क्षेत्र में संचालित कई हड्डी (ऑर्थोपेडिक) अस्पतालों को लेकर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि इन अस्पतालों में बिना योग्य विशेषज्ञ चिकित्सकों के धड़ल्ले से ऑपरेशन किए जा रहे हैं। कई अस्पतालों में पर्याप्त आपातकालीन सुविधाएं और मानकों के अनुरूप उपकरण भी उपलब्ध नहीं हैं, इसके बावजूद उनका संचालन निर्बाध रूप से जारी है। सूत्रों के अनुसार, छपका, लोढ़ी और उरमौरा जैसे इलाकों में स्थित कुछ निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली लंबे समय से सवालों के घेरे में है। यह वही क्षेत्र हैं, जहां से होकर संबंधित अधिकारी नियमित रूप से गुजरते हैं, लेकिन इन अस्पतालों की गतिविधियों पर प्रभावी निगरानी और कार्रवाई का अभाव बना हुआ है। जिले के अन्य क्षेत्रों में भी स्थिति कमोबेश इसी तरह बताई जा रही है। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि स्वास्थ्य विभाग को अक्सर अवैध अस्पतालों की जानकारी तब होती है, जब किसी मरीज की इलाज के दौरान मौत हो जाती है या अस्पताल में कोई विवाद और हंगामा खड़ा हो जाता है। ऐसी घटनाओं के बाद ही विभाग सक्रिय होता है और जांच, नोटिस या सीलिंग जैसी कार्रवाई की जाती है। इससे विभाग की नियमित निगरानी और निरीक्षण प्रणाली की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जिले में निजी अस्पतालों का संचालन किसी रहस्यमय तिलिस्म से कम नहीं है, जहां शिकायतों और चर्चाओं के बावजूद कार्रवाई नहीं हो पाती। समय-समय पर औपचारिक जांच और नोटिस जारी किए जाते हैं, लेकिन ठोस और स्थायी कार्रवाई के अभाव में अवैध अस्पताल संचालकों के हौसले बुलंद बने हुए हैं।
ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि जब एक ही अधिकारी इतने लंबे समय तक नोडल अधिकारी की जिम्मेदारी संभालते रहे, तो फिर अवैध अस्पतालों के संचालन पर प्रभावी अंकुश क्यों नहीं लगा सके हैं। यह स्थिति स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली, निगरानी व्यवस्था और जवाबदेही तंत्र पर गंभीर प्रश्न खड़ा करती है।

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रिहायशी मकानों और अंडरग्राउंड भवनों में चल रहे अस्पताल, अग्निशमन नियमों की अनदेखी

जिले में बड़ी संख्या में अस्पताल, क्लीनिक और पैथोलॉजी सेंटर रिहायशी मकानों, संकरी गलियों और अंडरग्राउंड भवनों में संचालित हो रहे हैं। इन संस्थानों में अग्निशमन विभाग के सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किया जा रहा है, जिससे किसी भी आपात स्थिति में बड़ी दुर्घटना की आशंका बनी रहती है।अधिकांश अस्पतालों में न तो पर्याप्त पार्किंग की व्यवस्था है और न ही एम्बुलेंस के आवागमन के लिए समुचित स्थान उपलब्ध है। कई जगहों पर अस्पताल मुख्य सड़क से दूर या संकरे मार्गों में संचालित हो रहे हैं, जिससे आपातकालीन स्थिति में मरीजों को समय पर उपचार मिलना मुश्किल हो सकता है।नियमों के अनुसार अस्पताल संचालन के लिए भवन की संरचना, अग्निशमन सुरक्षा, पार्किंग, एम्बुलेंस सुविधा और अन्य बुनियादी मानकों का पालन अनिवार्य है, लेकिन जिले में इन नियमों को दरकिनार कर सैकड़ों अस्पताल, क्लीनिक और पैथोलॉजी सेंटर संचालित हो रहे हैं।

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एक निजी क्लीनिक पर स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई फोटो। 

निष्पक्ष जांच की मांग 

स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराने तथा जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग की है। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो मरीजों की सुरक्षा के साथ गंभीर समझौता होता रहेगा और जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था पर से लोगों का भरोसा कमजोर होता जाएगा।

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पैथोलॉजी सेंटर कार्रवाई फाइल फोटो। श्रोत- सोशल मीडिया 

सोनभद्र।

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