"5.2 से 12.2 पहुंच गया हीमोग्लोबिन:: आखिर मेडिकल कॉलेज में इलाज हो रहा है या गरीब मरीजों की किस्मत से खेला जा रहा है?"
सोनभद्र
06:28 PM, Jun 3, 2026
सोनभद्र मेडिकल कॉलेज की दो पैथोलॉजी रिपोर्टों ने एक ऐसे सवाल को जन्म दिया है, जिसका जवाब केवल एक मरीज नहीं, बल्कि हजारों गरीब मरीज जानना चाहते हैं। एक ही मरीज के खून की जांच में 1 जून की रात 02:11 बजे हीमोग्लोबिन 5.2 g/dL दर्ज किया जाता है और उसी दिन सुबह 11:05 बजे दूसरी रिपोर्ट में वही हीमोग्लोबिन 12.2 g/dL दिखाया जाता है। यह केवल दो आंकड़ों का अंतर नहीं है। यह उस भरोसे का अंतर है।

वायरल रिपोर्ट:
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Published By
Neeraj Shukla
जिसके सहारे गरीब मरीज सरकारी अस्पताल का दरवाजा खटखटाता है।
दुर्घटना के बाद अस्पताल पहुंचा था मरीज
बताते चलें कि राबर्ट्सगंज कोतवाली क्षेत्र के सिद्धि गांव निवासी 26 वर्षीय राजाराम 31 मई को एक शादी समारोह में शामिल होने के लिए पन्नूगंज थाना क्षेत्र गए हुए थे। देर रात अपने एक साथी के साथ घर लौटते समय चतरा बाजार के पास एक ट्रैक्टर की टक्कर से दोनों घायल हो गए।घटना के बाद एम्बुलेंस के माध्यम से दोनों घायलों को राजकीय मेडिकल कॉलेज लोढ़ी के इमरजेंसी वार्ड में भर्ती कराया गया। चिकित्सकों ने उपचार के साथ खून की जांच सहित अन्य आवश्यक जांचें लिखीं। इसी दौरान मरीज के रक्त के नमूनों की जांच की गई, जिनकी रिपोर्ट अब सवालों के घेरे में है।
रिपोर्ट नंबर 2
रिपोर्ट में सिर्फ संख्या बदली, लेकिन मरीज की पूरी दुनिया बदल गई।
जिस परिवार को पहली रिपोर्ट में 5.2 हीमोग्लोबिन दिखा होगा, उसके घर में क्या बीती होगी, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। किसी मां की आंखों की नींद उड़ी होगी, किसी पत्नी के मन में पति को खोने का डर बैठ गया होगा, किसी बेटे ने रिश्तेदारों को फोन कर मदद मांगी होगी। सरकारी अस्पतालों में आने वाले अधिकांश मरीज करोड़पति नहीं होते। वे दिहाड़ी मजदूर, किसान, रिक्शा चालक, छोटे दुकानदार और गरीब परिवारों से आते हैं। उनके लिए एक गंभीर रिपोर्ट सिर्फ मेडिकल दस्तावेज नहीं होती, बल्कि पूरे परिवार पर टूटने वाली आफत का संकेत होती है। लेकिन कुछ घंटों बाद जब वही रिपोर्ट 12.2 दिखाने लगे, तो सवाल उठता है कि आखिर मरीज को डराया किसने? बीमारी ने या व्यवस्था ने? आखिर नौ घंटे में इतना बड़ा बदलाव कैसे? उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार पहली जांच में हीमोग्लोबिन 5.2 ग्राम प्रति डेसीलीटर पाया गया, जबकि लगभग नौ घंटे बाद दूसरी रिपोर्ट में यह 12.2 ग्राम प्रति डेसीलीटर दर्ज हो गया। सामान्य परिस्थितियों में इतने कम समय में हीमोग्लोबिन का इतना अधिक बढ़ जाना असाधारण माना जाता है।यदि इस दौरान मरीज को कई यूनिट रक्त नहीं चढ़ाया गया था, तो दोनों रिपोर्टों के बीच मौजूद यह भारी अंतर स्वाभाविक रूप से जांच और स्पष्टीकरण की मांग करता है। सवाल यह भी है कि दोनों रिपोर्टों में से सही कौन सी है?
यदि पहली रिपोर्ट गलत थी तो यह सिर्फ गलती नहीं, मानसिक उत्पीड़न है
कोई भी जिम्मेदार स्वास्थ्य व्यवस्था यह कहकर नहीं बच सकती कि "मशीन में त्रुटि हो गई होगी" या "सैंपल में समस्या रही होगी।"क्योंकि लैब की एक संभावित गलती का असर सीधे मरीज के मन, जेब और इलाज पर पड़ता है।एक गरीब परिवार पहली रिपोर्ट देखकर रक्त चढ़ाने, बड़े अस्पताल ले जाने या महंगे इलाज की तैयारी में हजारों रुपये खर्च कर सकता है। कोई उधार ले सकता है, कोई गहना गिरवी रख सकता है, कोई ब्याज पर पैसा उठा सकता है। यदि बाद में रिपोर्ट ही बदल जाए तो उस मानसिक और आर्थिक नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
सबसे बड़ा सवाल—अगर डॉक्टर ने पहली रिपोर्ट के आधार पर फैसला ले लिया होता तो?
चिकित्सा विज्ञान में डॉक्टर जांच रिपोर्ट पर भरोसा करके निर्णय लेते हैं। यदि पहली रिपोर्ट के आधार पर गंभीर एनीमिया मानकर रक्त चढ़ाने या अन्य उपचार का निर्णय ले लिया जाता और बाद में दूसरी रिपोर्ट सामने आती, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेता? यही कारण है कि यह मामला किसी एक कर्मचारी की गलती नहीं, बल्कि पूरी जांच प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल है।करोड़ों के मेडिकल कॉलेज में आखिर जवाबदेही किसकी है?सरकार मेडिकल कॉलेजों पर करोड़ों रुपये खर्च करती है। आधुनिक लैब, अत्याधुनिक मशीनें और विशेषज्ञ स्टाफ की बातें की जाती हैं। लेकिन जब एक ही मरीज की दो रिपोर्टें नौ घंटे के भीतर एक-दूसरे का विरोध करने लगें तो जनता यह पूछने को मजबूर हो जाती है कि आखिर जिम्मेदार कौन है?
क्या मशीनों का नियमित कैलिब्रेशन होता है?
क्या गुणवत्ता नियंत्रण की प्रक्रिया केवल कागजों तक सीमित है?
क्या संदिग्ध रिपोर्ट आने पर दोबारा परीक्षण की व्यवस्था है?क्या वरिष्ठ विशेषज्ञों द्वारा रिपोर्ट का सत्यापन किया जाता है?और सबसे महत्वपूर्ण—क्या ऐसी घटनाएं पहली बार हुई हैं या पहले भी होती रही हैं लेकिन सामने नहीं आ सकीं?गरीब मरीज प्रयोगशाला के नमूने नहीं हैं। सरकारी अस्पताल में आने वाला मरीज कोई आंकड़ा नहीं है। वह एक इंसान है, जिसके परिवार की उम्मीदें उससे जुड़ी हैं। उसकी रिपोर्ट में गलती सिर्फ तकनीकी चूक नहीं होती, बल्कि उसके पूरे परिवार की मानसिक शांति छीन सकती है। जब स्वास्थ्य व्यवस्था की एक रिपोर्ट मरीज को मौत के डर तक पहुंचा दे और दूसरी रिपोर्ट कुछ घंटों बाद उसे लगभग सामान्य बता दे, तो यह केवल लैब का विषय नहीं रह जाता। यह संवेदनशीलता, जवाबदेही और व्यवस्था की गंभीरता का विषय बन जाता है।
अब सिर्फ स्पष्टीकरण नहीं, जांच चाहिए
इस मामले में केवल सफाई देना पर्याप्त नहीं होगा। मेडिकल कॉलेज प्रशासन को सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए कि आखिर 5.2 और 12.2 में से सही आंकड़ा कौन सा है और दोनों रिपोर्टों में इतना बड़ा अंतर क्यों आया।साथ ही दोनों नमूनों की जांच प्रक्रिया, मशीन लॉग, गुणवत्ता नियंत्रण रिकॉर्ड तथा संबंधित कर्मचारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए, ताकि सच्चाई सामने आ सके।क्योंकि सवाल केवल एक मरीज का नहीं है। सवाल उन हजारों गरीब मरीजों का है जो सरकारी अस्पताल में यह विश्वास लेकर आते हैं कि उनके पास पैसा भले न हो, लेकिन कम से कम उनकी जांच सही होगी। यदि वही भरोसा टूट गया, तो स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी हार होगी।

